Friday, March 28, 2014

Ashwani kumar exclusive interview

संप्रग सरकार के दस सालों में अश्विनी कुमार एक ऐसा नाम हैं जिन्होंने करीब आधा दर्जन मंत्री पद संभाले तो वहीं आरोपों व मीडिया के दबाव के बाद इस्तीफा देकर सरकार से बाहर हुए। सरकार के भीतर व संगठन के साथ नजदीक से काम करने का अनुभव रखने वाले कुमार को कसक है कि आरोपों की सियासत ने संप्रग सरकार को उस कगार पर ला दिया जहां उसके कामों के मुकाबले इल्जामों का बोझ ज्यादा हो गया है। उनके मुताबिक प्रधानमंत्री और सरकार को कमजोर बताने और जताने की कवायद में विपक्ष जिम्मेदार है तो साथ ही कई अपनों का दामन भी बेदाग नहीं है। 'दैनिक जागरण' के विशेष संवाददाता प्रणय उपाध्याय से बातचीत में पूर्व कानून मंत्री ने कहा कि सरकार के भीतर से उठे कई मंत्रियों के विरोधाभासी सुरों और प्रचार ने भी कमजोर नेतृत्व की छवि बनाने में योगदान दिया।

आम चुनाव में संप्रग सरकार के एक दशक की समीक्षा हो रही है। आपकी नजर में सरकार कहां नाकाम रही और प्रधानमंत्री को क्यों कहना पड़ा कि अब उन्हें इतिहास से ही न्याय की उम्मीद है?

-मेरी नजर में संप्रग सरकार आजाद भारत में गरीबों व वंचितों के लिए सर्वाधिक योजनाएं बनाने और उनके क्रियान्वयन को धन आवंटन देने वाली सरकार रही। लेकिन, बीते 2-3 सालों में कुछ ऐसा माहौल बना कि आरोप-प्रत्यारोप का शोर बढ़ता गया और सरकार अपने अच्छे कामों पर चर्चा को जनता के बीच ले जाने में नाकाम रही। प्रधानमंत्री का यह कहना बेहद पीड़ादायक है कि अब इतिहास ही उनका आकलन करेगा। मेरी नजर में देश का इतिहास मनमोहन सिंह का आकलन कहीं अधिक समग्रता और सच्चाई से करेगा।

.लेकिन पीएम की छवि कमजोर दिखाने में पार्टी और सरकार के भीतरी तत्वों को कितना दोष देंगे?

-संप्रग सरकार एक दशक चली। इसमें बड़ा योगदान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पीएम के बीच बेहतरीन तालमेल का है। कांग्रेस अध्यक्ष ने पूरी मजबूती के साथ मनमोहन सिंह को समर्थन दिया। पीएम स्वभाव से विनम्र हैं। कई बार उनकी विनम्रता को भी कमजोरी मान लिया जाता है। विपक्ष इसी को दुष्प्रचार का साधन बनाता रहा। परमाणु करार या अन्य कई आर्थिक फैसलों पर देखा जा सकता है कि उन्होंने दृढ़ता के साथ निर्णय लिया।

हां, इतना जरूर मानूंगा कि समय-समय पर मंत्रिमंडल के भीतर से भी पीएम और सरकार के फैसलों के खिलाफ विरोध के ऐसे सुर उठते रहे जो नहीं उठने चाहिए थे। सामूहिक जिम्मेदारी से बंधे इन मंत्रियों के व्यवहार से नुकसान हुआ। यह जरूरी था कि उन्हें अनुशासित किया जाता।

कांग्रेस अध्यक्ष का पूरा समर्थन होने के बावजूद ऐसा होता रहा तो इसके पीछे क्या व्यक्तिगत हित जिम्मेदार थे?

-अब इसके सही कारण क्या थे इसकी किसी वक्त पर समीक्षा करनी होगी। हालांकि अभी मैं किसी निष्कर्ष पर टिप्पणी नहीं करूंगा।

भ्रष्टाचार अहम मुद्दा रहा जिसपर विपक्ष आरोप लगाता रहा। सरकार ने भी कई मंत्रियों के इस्तीफे कराए। आपको भी सीबीआइ जांच रिपोर्ट देखने को लेकर उठे विवाद के बाद पद छोड़ना पड़ा। इस पर क्या कहेंगे?

-देखिए, भ्रष्टाचार एक मुद्दा है इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। पूरे समाज में इसका विस्तार है और इसके खिलाफ व्यापक स्तर पर लड़ाई जरूरी है। लेकिन, महज आरोप काफी नहीं है। न्याय का नैसर्गिक सिद्धांत है कि कानून प्रक्रिया से सिद्ध न होने तक हर व्यक्ति मासूम है। दुर्भाग्यवश बीते कुछ सालों में आरोपों का शोर और उन्हें लेकर मीडिया का दबाव भी इस कदर बढ़ा कि सरकार के फैसले भी प्रभावित हुए।

अपने मामले में स्पष्ट कर दूं कि मेरे खिलाफ न तो कोई आरोप है और न ही सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी। मुझे इस्तीफे का कोई मलाल नहीं क्योंकि संसदीय व राजनीतिक मर्यादा के चलते मैंने त्यागपत्र दिया और पार्टी व जनता दोनों से मुझे इसके बाद भरपूर स्नेह मिलता रहा।

यानी आप कहेंगे कि केवल मीडिया के दबाव में आपका इस्तीफा हुआ?

-जरूर। मीडिया के दबाव में ही पवन बंसल और अशोक चह्वाण के भी इस्तीफे हुए। उन्हें उम्मीदवार बनाए जाने का फैसला इसकी तस्दीक करता है। सिंहावलोकन करें तो लगता है कि दबाव में सरकार ने कई अतिवादी निर्णय भी कर दिए। उदाहरण के लिए दिल्ली दुष्कर्म कांड के बाद बने एंटी-रेप कानून में कई ऐसे प्रावधान हैं जिनका गलत इस्तेमाल संभव है। एक वकील होने के नाते मुझे लगता है कि इसमें जल्द से जल्द संशोधन की जरूरत है ताकि इसका दुरुपयोग न हो।

चुनावी परीक्षा से पहले क्या मानेंगे संप्रग सरकार के कौन से विषय कमजोर रह गए?

-बीते कुछ समय में हम जनता की नब्ज पढ़ने में नाकाम हुए और लोगों से हमारा संवाद कमजोर हुआ। राज्यों में हम अपने संगठन को मजबूत करने में भी कामयाब नहीं हुए। जिसके कारण लोगों के बीच हमारे अच्छे कामों का भी सही आकलन नहीं हो पा रहा।

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