Monday, March 31, 2014

UPA empty hand on economic front in the time of election

कहते हैं अंत भला तो सब भला, लेकिन संप्रग सरकार का अंतिम वर्ष अर्थव्यवस्था के लिए कुछ बेहतर साबित नहीं हुआ है। देश की आर्थिक स्थिति आज खस्ताहाल है। सोमवार को समाप्त हो रहा संप्रग-दो का आखिरी वित्तीय वर्ष, संप्रग-एक और राजग के आखिरी साल की तुलना में बेहद खराब रहा है। हालत यह है कि चुनावी मैदान में आर्थिक मोर्चे पर दिखाने के लिए सरकार के पास कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है।

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अर्थव्यवस्था की स्थिति ऐसी है कि वित्त वर्ष 2013-14 में विकास दर घटकर पांच प्रतिशत से नीचे रहने का अनुमान है जो पिछले दस साल में न्यूनतम स्तर होगा। आंकड़ों में थोक महंगाई दर मामूली रूप से घटकर फरवरी में 4.68 प्रतिशत पर जरूर आ गयी है, लेकिन खुदरा महंगाई दर भी अब भी दहाई के अंक की दहलीज पर खड़ी है। पता नहीं यह कब दहाई के अंक को पार कर जाये। रोजमर्रा की जरूरत की चीजों के दाम आसमान पर हैं। यही वजह है कि रिजर्व बैंक भी ब्याज दरों में कटौती से कतरा रहा है। बेरोजगारी भी चरम पर है। केंद्रीय श्रम मंत्रालय के मुताबिक 15 से 29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर 13 प्रतिशत से अधिक है। सोने के आयात पर कड़ाई के चलते चालू खाते के घाटे में गिरावट जरूर आयी है, लेकिन यह स्थायी नहीं है। चुनाव के बाद नई सरकार बनने पर चालू खाते का घाटा फिर ऊपर जा सकता है। सबसे बड़ी चुनौती रुकी हुई महा परियोजनाएं हैं। फरवरी महीने तक करीब 500 अरब रुपये की परियोजनाएं फसीं हुई थीं। रुपये के मुकाबले डालर का मूल्य भी 60 रुपये पर बना हुआ है जो कि संप्रग-एक के आखिरी वर्ष में लगभग 46 रुपये था। संप्रग-एक के आखिरी वर्ष में विकास दर थोड़ी बेहतर 6.7 प्रतिशत थी। हालांकि, महंगाई दर आठ प्रतिशत से ऊपर थी। वैसे, राजग के आखिरी वर्ष में अर्थव्यवस्था के स्तंभ संप्रग-एक और संप्रग-दो के मुकाबले मजबूत थे। वित्त वर्ष 2003-04 में विकास दर 8 प्रतिशत से अधिक थी जबकि महंगाई दर 5.5 प्रतिशत के निम्न स्तर पर थी। उस समय चालू खाते का घाटा भी एक प्रतिशत के आस-पास था।

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